Wednesday, June 3, 2009

मैं बैठा हूँ .......( आज भी )...

रवि आया तारों के ऊपर ,
आकाश निहारे बैठा हूँ
मैं नवल कोपलों के ऊपर ,
नव ख्वाब सजाये बैठा हूँ । ।

कल रात की पीड़ा से उठकर ,
नव इंतज़ार में बैठा हूँ
बिखरे सपनों की फिर से अब ,
मैं नाव बनाए बैठा हूँ । ।

कुटिल मनोहर ख्वाईस की ,
मैं आस लगाए बैठा हूँ
खूंखार तरंगों की मन में ,
मैं लहर चलाये बैठा हूँ । ।

इस मायावी धन वैभव का ,
आकार समझ ना आता है
इस जीवन का अब तेरे बिन ,
अभिप्राय समझ आता है । ।

अब बीच राह में तेरी ही ,
आवाज लगाए बैठा हूँ
कश्ती अब अपने जीवन की ,
मैं बीच फंसाए बैठा हूँ । ।

ऊपर नीचे सर करने पर ,
रवि बचा खुचा अब दिखता है
तेरे आने की आस लिए ,
मैं समा जलाए बैठा हूँ । ।

सुर्ख थके से होंठों पर ,
मैं जाम लगाए बैठा हूँ
सोये सोये अरमानों पर ,
मैं हवा चलाये बैठा हूँ । ।

चंदा संग तारे भी मुझपर ,
अब अट्टहास कर लेते हैं
यह देख मूक वन पादप भी ,
दीर्घ स्वांस भर लेते हैं । ।

रवि अस्त हुआ पर ख्वाब नही ,
मैं प्यास जगाये बैठा हूँ
ईश्वर के दर पर मस्तक है ,
मैं हाँथ उठाये बैठा हूँ । ।

तेरे कोमल अंगों की मैं ,
आकृति बनाए बैठा हूँ
तेरी योवन अभिलाषा में ,
मैं ताप बढाए बैठा हूँ । ।

हो गया ख़त्म अब इंतज़ार ,
मैं आँख जलाए बैठा हूँ
गया अंत अब तीव्र ज्वार ,
मैं शीष झुकाए बैठा हूँ । ।

मोती सम नीर नयन से अब ,
मई आज गिराए बैठा हूँ
मैं गर्म रेत पर बारिश की ,
उम्मीद जगाये बैठा हूँ । ।

सुनसान घोर है अंधियारा ,
मैं दीप जलाए बैठा हूँ
अब बस है तनहा रात संग ,
मैं खाट सजाये बैठा हूँ । ।

तेरे अधरों के चुम्बन की ,
जो आस लगाए बैठा था
उस ख़ास तमन्ना की अब मैं ,
आहुति जलाए बैठा हूँ । ।

मैं आस लगाए बैठा था ,
मैं प्यास जगाये बैठा था
अब नयन जलाए बैठा हूँ ,
अब बदन जलाए बैठा हूँ । ।

नीर नयन से बहता है ,
जो विरहा की अग्नि में अब
सब अंत हुआ उस ख्वाब संग ,
अब प्यास बुझाए बैठा हूँ । ।

कल रात भी ऐसे बैठा था ,
इस रात भी ऐसे बैठा हूँ
इस जीवन की लाचारी में ,
लाचार फंसा सा बैठा हूँ । ।

फिर नयन जलाए बैठा हूँ ,
फिर बदन जलाए बैठा हूँ
मैं सदियों से ही बैठा हूँ ,
अब प्यास बुझाए बैठा हूँ .............

किस राह चलूँ ...? ?

एक नवयुवक जिसके सीने में गरम खून है तो हांथों में लाल गुलाब भी हैवो उबल भी सकता है और साथ में पिघल भी सकता हैसमाज में फैली लाचारी को देखकर वो उसका नाश करना चाहता है पर अपनी प्रेमिका के प्रेम में आकर्षित भी है.... पर अभी वह अपनी राह चुनने में समर्थ नही हो पाया है ..........




नवजात कली सा खिलूँ यहाँ या सूखी डाल म्रणाल बनूँ ?
पैरों में बंधन बाँध चलूँ या पक्षी बन आजाद फिरून ?
बन वीर प्रतापी राज करूँ या प्रेम गली की राह चलूँ ?
तीखी धार कृपाण चलूँ या माया मोह मैं जाल फंसूं ?
भावना ह्रदय में बहने दूँ या कामना ह्रदय की आज सुनूँ ?
उबले भावों का स्वाद चखूँ या प्रेम सुधारस पान करूँ ?
किस डगर चलूँ किस मोड़ मुडून किस राह में करता आह फिरून ?
सीने में रक्त उबाल चलूँ या प्रेम सरोवर डूब चलूँ
? ? ? ?

करवट

ना जाने कब सोये अरमानों को करवट बदलनी हो ,
दिल में बसे अधूरे ख्वाबों को उड़ान भरनी हो
अभी सवेरा है पूरा कर लो तमन्नाओं को ,
ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम होनी हो । ।

क्या करूँ...

खुशबू की तरह महकूँ या लोहे की तरह पिघलूं ?
चंदा की तरह चमकूँ या सूरज की तरह जलूं ?
लौ की तरह सुलगूँ या शोले की तरह दह्कूँ ?
हवा की तरह फैलूं या आंधी की तरह रोंदू ?
मेरे रब मुझे मेरी डगर दिखा .................
मई किताब पर बढूँ या आग पर फैलूं ?

यकलख्त

जो दूर हुए तुमसे तो दिल भर गया ,
यकलख्त ही वक्त के साथ दिल उमड़ पड़ा
रोकने चले तुमको तो फरार हो गए आंसू ,
और यादों की किताब का एक पन्ना और भर गया । ।