Monday, May 11, 2009

नए साल का आशचर्य

हुई सुबह उठकर देखा ,
वर्ष नया तो हर्ष हुआ
पर वर्ष नया तो खुश होना क्या ,
जब कालचक्र भी प्रसन्न हुआ ।।

है दिवस नया पर सूर्य वही ,
है फूल नया पर सुगंध वही
है साल नया आगाज वही ,
है जोश नया पर लोग वही ।।

है ख़बर वही आवाज वही ,
है नया और क्या कुछ भी नही
है आठ गया नौ की बारी ,
हैं काल से प्रकृति भी हारी ।।

है नौ दस की ओर बढ़ा ,
धरती का ख़ुद पर कर्ज बढ़ा
नव सुबह तो सैकरों बार हुई ,
जब कार्ड मिला आशचर्य हुआ ।।

है इस सुबह में अनोखा क्या ,
ये जानने का मेरा रहस्य बढ़ा । ।

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