Wednesday, May 20, 2009

अनिश्चित प्रयास...

श्रांत वातावरण था , घड़ी में सुई अपने तीव्र वेग से संध्या के पाँच बजाने को व्याकुल हो रही थीसूर्य देवता अन्य किसी सुप्त स्थान पर अपना तेज प्रकाशित करने को तत्पर थेमै उस एकांत वातावरण का अकेला साक्छी था क्यूँकी मेरे नेत्रों ने अन्य किसी को देख सकने में ख़ुद को असमर्थ घोषित कर दिया थासंध्या की शान्ति मेरे मष्तिस्क को एक सुनसान जगह पर अजीब सा घूँघट ओढ़कर बैठी बूढी औरत की तरह प्रतीत हो रही थी जिसका चेहरा खौफनाक सच से लिपटा हुआ भी लग रहा था और कई रहस्यों को मन में दबाये जिन्दगी से उदासीन मासूम भी लग रहा था । वहाँ छाई हुई वो शान्ति जाने क्यूँ खौफनाक सी शान्ति लग रही थी जैसे काले बुरके में कोई भयावह स्त्री मुझे अपने नुकीले नेत्रों से एकटक घूर रही हो और अब उस शान्ति से मेरा मन अशांत हो उठा थावह खौफनाक द्रश्य मेरे अशांत मन में धीमी - धीमी बेचैनी उत्पन्न करते हुए पुरानी कहानियों के प्रेतों कि तरह समाये जा रहा थामेरे अस्थिर मन में उसी समय कई विचार ज्वार - भाटों की तरह उथल - पुथल कर रहे थे जिससे मेरा मन और अशांत हो उठता थाज्वार - भाटे तो एक निश्चित समय के बाद अस्तित्वहीन हो जाते हैं पर मेरे मन में उठे विचारों का अंत असंभव सा लग रहा रहा थामै इस स्वार्थी और कठोर दुनिया में अपने ह्रदय में नए - नए ख्वाबों को सँजोकर अपनी एक अलग पहचान बनाने निकल पड़ा थामैं अकेला ही नही इस अजनबियों का शोषण करने वाली दुनिया में अपना अस्तित्व कायम करने में लगा था बल्कि आज इस दुनिया में चारों तरफ़ हर व्यक्ति जुटा हुआ है, अपना अस्तित्व बनाने में , लगा हुआ है अपनी पहचान दुनिया को बताने में , इस इंसानों का दमन करने वाली दुनिया में अपनी महत्वकान्छावों को पूरा करने में , किसी तरह से , किसी भी उपाए सेआज इस असीमित दर से बढती हुई जनसँख्या वाली दुनिया में लोगों की ये इच्छाएं सर्वप्रथम हैंआज के युग में प्रत्येक व्यक्ति जन्म लेते ही इस सोच से भी ज्यादा खतरनाक और भयावह दुनिया की एक अनदेखी दौड़ में शामिल हो जाता है जिसके अनगिनत और अनदेखे प्रतिभागी एक दूसरे से आगे निकलने के लिए हर प्रयास में रत हैं । खैर , अब शाम ने अपनी निर्लज्जता को त्यागकर आधी ओढ़ी काली चादर को पूरे बदन में लपेटना शुरू कर दिया है और शोर मचाती हुई खामोशी और सन्नाटे ने अन्धकार का चुम्बन करना प्रारम्भ कर दिया है और मैं जाम हुए पैरों , ख़्वाबों के दंश से डंसी आँखों और कल्पित विचारों के साथ वापस घर की ओर धीमे कदमो से मुड़ गया यह सोचते हुए कि हर अनदेखे प्रतिभागी को इस अनिश्चित प्रयास को करने से पूर्व यह नही मालूम कि उसका यह प्रयास सफल होगा या नहीं , या फिर वो ...................

6 comments:

  1. सात अरब लोगों के बीच पहचान का संकट और इस हेतु हमारे प्रयास हमें कहाँ ले जा सकते हैं..समझा जा सकता है...

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  2. aap ki bat sahi to he par subah itni nirash nanhi hoti
    sham ke kyalat avsad se bhare hote hen
    phaisale subahi hi karo

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  3. sweet writing ,my dear.pl niranter likhte raho ,bhavnaon ki kimat hum samajhte hain.
    swagat tumhara.
    dr. bhoopendra

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  4. kaafi achcha likha hai khyaal bhi achche hai.or likhe intjaar rahega.
    Deepak "be-dil"

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  5. आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . लिखते रहिये
    चिटठा जगत मैं आप का स्वागत है

    गार्गी

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