Monday, May 11, 2009

सुबह का सुख..

अब सुबह हुई नव किरण खिली ,
त्रण पर की बूंदे खोने लगी
वो रात्रि अँधेरी मिटने लगी ,
धरती पर चहुँ दिस लाल खिली ।।

सुमन मींजकर आँख उठे ,
सिकुडे सिकुडे थे फैल गए
देखे प्रभात वो मुस्काये ,
पुष्पों को भी खुशी मिली ।।

जो स्वप्न हमे दरवाते हैं ,
उस रात से तो ये सुबह भली
अब सुबह हुई नव किरण खिली ,
त्रण पर की बूंदे खोने लगी ।।

जगा मनुष्य स्वप्न में से ,
पुष्पों की उसे सुगंध मिली
पत्ते जो रात्रि मुरझाये थे ,
जो सुबह हुई मुस्काये थे ।।

पशु पक्षी सभी उठ गए अब ,
सुखद समय में खुश थे सब
जो सुबह हुई तो सुमन खिले ,
सुमनों के बीच है कली खिली ।।

अब सुबह हुई नव किरण खिली ,
त्रण पर की बूंदे खोने लगी ।।

पर्वत जो शोक में डूबा था ,
जो शोक में आँखे मूंदा था
नेत्रों ने जो उजियाला देखा ,
वो झूम उठे मैंने देखा ।।

नदियाँ भी अपना तेजी से ,
किलकारी वे भरने लगी
अब सुबह हुई नव किरण खिली ,
त्रण पर की बूंदे खोने लगी ।।

मै निकला घर से बाहर को ,
सुमन खिले थे इतर -बितर
कोई लाल रंग तो कोई हरा ,
देखा पुष्पों से बाग़ भरा ।।

जो सुबह कल को आई थी ,
वो खोई हुई सुबह मिली
अब सुबह हुई नव किरण खिली ,
त्रण पर की बूंदे खोने लगी ।।

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