अब सुबह हुई नव किरण खिली ,
त्रण पर की बूंदे खोने लगी ।
वो रात्रि अँधेरी मिटने लगी ,
धरती पर चहुँ दिस लाल खिली ।।
सुमन मींजकर आँख उठे ,
सिकुडे सिकुडे थे फैल गए ।
देखे प्रभात वो मुस्काये ,
पुष्पों को भी खुशी मिली ।।
जो स्वप्न हमे दरवाते हैं ,
उस रात से तो ये सुबह भली ।
अब सुबह हुई नव किरण खिली ,
त्रण पर की बूंदे खोने लगी ।।
जगा मनुष्य स्वप्न में से ,
पुष्पों की उसे सुगंध मिली ।
पत्ते जो रात्रि मुरझाये थे ,
जो सुबह हुई मुस्काये थे ।।
पशु पक्षी सभी उठ गए अब ,
सुखद समय में खुश थे सब ।
जो सुबह हुई तो सुमन खिले ,
सुमनों के बीच है कली खिली ।।
अब सुबह हुई नव किरण खिली ,
त्रण पर की बूंदे खोने लगी ।।
पर्वत जो शोक में डूबा था ,
जो शोक में आँखे मूंदा था ।
नेत्रों ने जो उजियाला देखा ,
वो झूम उठे मैंने देखा ।।
नदियाँ भी अपना तेजी से ,
किलकारी वे भरने लगी ।
अब सुबह हुई नव किरण खिली ,
त्रण पर की बूंदे खोने लगी ।।
मै निकला घर से बाहर को ,
सुमन खिले थे इतर -बितर ।
कोई लाल रंग तो कोई हरा ,
देखा पुष्पों से बाग़ भरा ।।
जो सुबह कल को आई थी ,
वो खोई हुई सुबह मिली ।
अब सुबह हुई नव किरण खिली ,
त्रण पर की बूंदे खोने लगी ।।
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